हत्या के केस में WhatsApp चैट बनी कमजोर कड़ी! सुप्रीम कोर्ट ने दोषी को किया बरी, जानिए अदालत ने क्यों पलटा फैसला

हत्या के केस में WhatsApp चैट बनी कमजोर कड़ी! सुप्रीम कोर्ट ने दोषी को किया बरी, जानिए अदालत ने क्यों पलटा फैसला

हत्या के केस में WhatsApp चैट बनी कमजोर कड़ी! सुप्रीम कोर्ट ने दोषी को किया बरी, जानिए अदालत ने क्यों पलटा फैसला

नई दिल्ली। हत्या के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल व्हाट्सऐप चैट के आधार पर किसी व्यक्ति की हत्या के मामले में दोषसिद्धि बरकरार नहीं रखी जा सकती, खासकर तब जब संबंधित संदेशों में किए गए दावों की पुष्टि प्रत्यक्ष जानकारी से न हो।

न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष के दो गवाहों के बीच हुई व्हाट्सऐप बातचीत आरोपी को हत्या का दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

दो गवाहों की चैट में था हत्या का जिक्र

मामले में अभियोजन पक्ष ने दो गवाहों के बीच हुई व्हाट्सऐप चैट को आरोपी के खिलाफ साक्ष्य के तौर पर पेश किया था। इस बातचीत में दावा किया गया था कि मृतक की हत्या के लिए आरोपी जिम्मेदार था। संदेशों में यह भी उल्लेख था कि मौत से पहले आरोपी और मृतक के बीच झगड़ा हुआ था।

हालांकि, अदालत के सामने अहम सवाल यह था कि क्या इन संदेशों को हत्या में आरोपी की भूमिका साबित करने के लिए विश्वसनीय साक्ष्य माना जा सकता है। दोनों गवाहों में से किसी ने भी कथित घटना को अपनी आंखों से देखने की बात नहीं कही थी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज किया चैट को पर्याप्त सबूत मानना?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गवाह-5 और गवाह-6 के बीच संदेशों का आदान-प्रदान अपने आप यह साबित नहीं करता कि घटना वाली रात मृतक आरोपी के घर में मौजूद था या आरोपी ने उस पर हमला किया था।

अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 6 के तहत इस बातचीत को सुनी-सुनाई बातों के साक्ष्य संबंधी नियम के अपवाद के रूप में स्वीकार करने से भी इनकार कर दिया। अदालत के मुताबिक, केवल संदेशों में किसी घटना या आरोपी की कथित भूमिका का उल्लेख होना, उस आरोप को स्वतः साबित नहीं करता।

सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट ने बरकरार रखी थी सजा

अपीलकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 यानी हत्या और धारा 201 यानी साक्ष्य मिटाने से संबंधित आरोप लगाए गए थे। सेशन कोर्ट ने उसे दोषी ठहराया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने भी उसकी सजा बरकरार रखी।

दोनों अदालतों के फैसलों से असंतुष्ट होकर आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और व्हाट्सऐप संदेशों की प्रासंगिकता पर विचार करने के बाद शीर्ष अदालत ने दोषसिद्धि को कायम रखने के लिए इन संदेशों को अपर्याप्त माना और आरोपी को बरी कर दिया।

डिजिटल चैट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या है संदेश?

यह फैसला बताता है कि आपराधिक मामलों में डिजिटल बातचीत को साक्ष्य के रूप में पेश करना और उसके आधार पर आरोप साबित करना दो अलग-अलग बातें हैं। व्हाट्सऐप संदेशों का मूल्यांकन उनकी विश्वसनीयता, प्रासंगिकता और मामले के अन्य साक्ष्यों के साथ उनके संबंध को ध्यान में रखकर किया जाना जरूरी है।

अदालत के फैसले का मुख्य संदेश यही है कि किसी चैट में लगाए गए आरोप अपने आप अपराध साबित नहीं करते। दोषसिद्धि के लिए अभियोजन पक्ष को कानून के मुताबिक पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं।