बीजेपी में बड़ा संगठनात्मक उलटफेर: क्या अब ‘संगठन को किनारे करने वालों’ की बारी? स्मृति ईरानी, सिद्धार्थ शंभु और कर्मवीर सिंह के सामने बड़ी चुनौती
बीजेपी में बड़ा संगठनात्मक उलटफेर: क्या अब ‘संगठन को किनारे करने वालों’ की बारी? स्मृति ईरानी, सिद्धार्थ शंभु और कर्मवीर सिंह के सामने बड़ी चुनौती
रायपुर। भारतीय जनता पार्टी ने संगठनात्मक स्तर पर बड़ा फेरबदल करते हुए कई राज्यों के प्रभारियों और संगठन से जुड़े पदाधिकारियों की जिम्मेदारियां बदल दी हैं। छत्तीसगढ़ में भी इस बदलाव का असर साफ नजर आ रहा है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की नई टीम के तहत स्मृति ईरानी को प्रदेश प्रभारी और सिद्धार्थ शंभु को सह प्रभारी बनाया गया है। वहीं, संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी कर्मवीर सिंह को सौंपी गई है। दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ भाजपा के संगठन में लंबे समय तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पवन साय को झारखंड और अजय जामवाल को महाराष्ट्र की जिम्मेदारी दी गई है।
इस फेरबदल को केवल पदों की अदला-बदली के रूप में नहीं, बल्कि संगठनात्मक व्यवस्था को नए सिरे से मजबूत करने की कवायद के तौर पर भी देखा जा रहा है। हालांकि, असली परीक्षा अब यह होगी कि नए पदाधिकारी कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने और संगठन को जमीनी स्तर पर सक्रिय बनाने में कितना सफल होते हैं।
स्मृति ईरानी और सिद्धार्थ शंभु की नियुक्ति के पीछे क्या है रणनीति?
भाजपा ने पूर्व केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय महामंत्री स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ का प्रदेश प्रभारी बनाया है। उनके साथ बिहार के भाजपा नेता और राष्ट्रीय मंत्री सिद्धार्थ शंभु को सह प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। दोनों नियुक्तियां पार्टी के राष्ट्रीय संगठन में हुए व्यापक बदलाव का हिस्सा हैं।
नितिन नबीन इससे पहले छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। राज्य में पार्टी की सत्ता में वापसी के दौर में उन्होंने संगठनात्मक गतिविधियों और जमीनी संपर्क पर काम किया था। अब राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने के बाद प्रदेश में उनके साथ काम कर चुके नेताओं को नई भूमिका दिए जाने को संगठनात्मक समन्वय के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
हालांकि, नए प्रभारियों के सामने चुनौती केवल संगठनात्मक कार्यक्रमों की समीक्षा करना नहीं होगी। उन्हें प्रदेश नेतृत्व, जिला इकाइयों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर तालमेल भी स्थापित करना होगा।
पवन साय और अजय जामवाल की विदाई से बदला संगठन का समीकरण
छत्तीसगढ़ भाजपा में पवन साय और अजय जामवाल लंबे समय तक संगठन के महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल रहे। पवन साय वर्ष 2016 से संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। वहीं, अजय जामवाल को वर्ष 2020 में क्षेत्रीय संगठन मंत्री बनाकर छत्तीसगढ़ भेजा गया था।
अब पवन साय को झारखंड और अजय जामवाल को महाराष्ट्र में नई जिम्मेदारी दी गई है। छत्तीसगढ़ में संगठन महामंत्री का दायित्व कर्मवीर सिंह को सौंपा गया है, जो इससे पहले झारखंड में संगठन महामंत्री के रूप में काम कर रहे थे।
इस बदलाव के साथ प्रदेश भाजपा के संगठनात्मक नेतृत्व में नया अध्याय शुरू हुआ है। कर्मवीर सिंह के सामने पार्टी की जिला और ब्लॉक इकाइयों को सक्रिय रखने, कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बढ़ाने और सरकार तथा संगठन के बीच समन्वय मजबूत करने की चुनौती होगी।
कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करना होगी सबसे बड़ी चुनौती
सत्ता में रहने के बावजूद यदि पार्टी कार्यकर्ताओं में असंतोष बना रहता है, तो इसका असर संगठन की सक्रियता पर पड़ सकता है। लेख में दावा किया गया है कि प्रदेश में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने इस्तीफे दिए हैं और उन्हें मनाने के प्रयास पर्याप्त नहीं रहे। हालांकि, इस्तीफों की संख्या और इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
ऐसे में स्मृति ईरानी, सिद्धार्थ शंभु और कर्मवीर सिंह के सामने नाराज कार्यकर्ताओं से संवाद स्थापित करना महत्वपूर्ण होगा। पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं की शिकायतें सुनना, उनकी भूमिका स्पष्ट करना और संगठनात्मक जिम्मेदारियों में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना नए नेतृत्व की प्राथमिकताओं में शामिल हो सकता है।
संगठन की मजबूती केवल बैठकों और नियुक्तियों से तय नहीं होती, बल्कि यह भी देखना होता है कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ता खुद को कितना महत्वपूर्ण महसूस करते हैं।
सरकार और संगठन के बीच तालमेल भी होगी बड़ी परीक्षा
छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार और संगठन दोनों के सामने समन्वय बनाए रखने की चुनौती है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरल और सौम्य छवि का उल्लेख करते हुए लेख में प्रशासनिक अधिकारियों पर नियंत्रण और सरकारी कामकाज में सुधार को लेकर सवाल उठाए गए हैं। ये लेख के विश्लेषणात्मक दावे हैं; इनके समर्थन में कोई स्वतंत्र आंकड़ा प्रस्तुत नहीं किया गया है।
इसके साथ ही, पहली बार मंत्री बने नेताओं के कामकाज और सरकारी व्यवस्था को लेकर उठाए गए सवाल भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा हैं। नए संगठनात्मक नेतृत्व को सरकार की प्राथमिकताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाना होगा।
2028 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को मजबूत करने की चुनौती
छत्तीसगढ़ में भाजपा के सामने आने वाले समय में संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाए रखने की जिम्मेदारी है। नए प्रभारियों और संगठन महामंत्री को जिला अध्यक्षों, मंडल पदाधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बढ़ाना होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नया संगठनात्मक नेतृत्व नाराज कार्यकर्ताओं को साथ लाकर सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बना पाएगा? भाजपा के इस फेरबदल का वास्तविक असर आने वाले महीनों में संगठन की सक्रियता, कार्यकर्ताओं की भागीदारी और प्रदेश नेतृत्व के समन्वय से स्पष्ट होगा।